विरहा सावन की

आली रे आली ,कैसी उलझन है मैंने पाली                 रम गई मैं तो पिया राग में ,छाई बदलिया सावन की काली ।

सूझ रहा ना होश रहा ,प्रियतम की बाहों का सूना आगोश रहा                                                                खड़ी रही मैं उस गैले में,प्रिय के चरणों का जहां खोज रहा।

बाट निहारु, उलझे केस सवारू                             नैनो के दीपक मंद पड़े, नींदों में भी तेरा नाम पुकारू।

गरज गरज के सावन बोला, नर्म हवा के द्वार खोला    जल रही हूं उलझ रही हू, कब आएगा तू ओ मेरे ढोला।

सूरत घणी रह-रहकर आवे,अखियन से आंसू बह तन पेे जावे                                                             पिघल रही हूं मोम की भांति,  ई योवन वेरी मेरे तन को खावे।